एक संवैधानिक दस्तावेज बेगमपुरा।
विश्व में शांति साझीवार्ता, समानता और स्वतन्त्रता की स्थापना के लिए एक संवैधानिक दस्तावेज– बेगमपुरा
बेगमपुरा एक खुशहाल मातृभूमि है। इस मातृभूमि के समाज में केवल सुख ही सुख है। किसी को कोई दुःख, पीड़ा या हानि नहीं है। आर्थिक दृष्टि से यहाँ न कोई अमीर है, न कोई गरीब और राजनीतिक दृष्टि से न किसी राजा को कोई कर देना पड़ता है, न ही कोई पराजित राजा किसी विजयी राजा को कर (कर) देता है, अंततः उस शाश्वत राजा के अलावा यहाँ कोई शासक नहीं है। ये विचार आदि धर्म अनमोल रतन, एडवोकेट, प्रोफेसर लाल सिंह जी ने अपनी पुस्तक ” सटीक बाणी श्री गुरु रविदास जी तथा तत्त सिद्धांत,” में लिपिबद्ध किए हैं।
पंजाबी दुनिया पत्रिका के जून और जुलाई 1977 के विशेषांक में गुरु रविदास जी के बेगमपुरा के संबंध में विभिन्न विद्वानों द्वारा दिए गए विचारों का विवरण प्रोफेसर साहिब ने अपनी उपर्युक्त पुस्तक “गुरु रविदास बाणी और मार्क्सवाद” के अध्याय में लिपिबद्ध किया है। हम इसके कुछ अंश यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं।
गुरु रविदास जी ने इस शब्द के बीच अटल सच्चाईयां निरूपित की हैं। इनका आधार वैज्ञानिक सत्य है। यही अटल सिद्धांत है।इस शब्द के विचारों में इतनी सरलता, इतनी स्पष्टता, इतनी गहराई, इतनी गंभीरता, इतनी विशालता और परिपक्वता निरूपित है कि इस शब्द के सृजन के बीच प्रयोग हर वाक्य (तुक) यहां तक कि हर शब्द सैद्धान्तिक गुणों का धारणी बन गया है। इसलिए शब्द की हर प्रस्तावना अपने-आप के बीच एक सिद्धांत समाकर बैठा है। इसकी पुष्टि भारत के प्रसिद्ध संगीत शास्त्रियों की राग निर्णायक कमेटी ने की है:-
“गौउड़ी गंभीर प्रकृति का राग है। विलखती आत्मा कृपा की याचना करती है और अपने-आप की खोज करती है। इसलिए इस राग में गुरु जी ने मन, मति, बुद्धि, आत्मा, मौत और मुक्ति आदि गंभीर विषयों में गुरबाणी उच्चारण की हुई है।”
गुरु रविदास जी महान चिंतक हैं। उनकी दूरदृष्टि, गहरी सोच, विशाल दृष्टिकोण, विश्वव्यापी ज्ञान और चमत्कारी क्रांतिकारी वैज्ञानिक पहुंच ने शब्द “बेगम पुरा सहर को नाउ ” के बीच विश्वव्यापी विचारधारा का सृजन किया है, जो आज के विश्व के महान चिंतकों की विचारधारा की अपेक्षा कहीं अधिक वैज्ञानिक तर्कयुक्त और अमल के बीच पूरी उतरने वाली है। इस की परिपक्वता करते हुए डॉ. जीत सिंह शीतल जी लिखते हैं –
“इस संदर्भ या प्रसंग में जब हम भक्त (गुरु) रविदास के ऊपरी शब्द (बेगमपुरा शहर को नाउ) को देखते हैं, तो बड़े-बड़े समाज वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी और राजसी शास्त्री चकित रह जाते हैं। मार्क्स लेनिन आदि भी शायद ऐसे सम-देश सम-राज, सम-शहरी, सम-अधिकारी और मानव वतनगाह का संकल्प न कर सके।”””
इस लेख में एक अन्य जगह डॉ. शीतल जी अटल सच्चाई का भेद खोलते हुए लिखते हैं –
“किसी महान पुरुष ने देश की सीमाओं से उसके हितों से ऊपर उठकर सारे विश्व के ऊपर नज्तर नहीं दीं। यही कारण है कि आज तक अंतर देशों के झगड़े खत्म नहीं हुए।'”
डॉ. जीत सिंह शीतल के इन कथनों से अटल सच्चाई से तो पर्दा उठाया ही गया है। उन्होंने गुरु रविदास जी को एक महानतम चिंतक के तौर पर भी तर्क के साथ दलीलें देकर सिद्ध किया है। इस संबंध में डॉ. शीतल स्वयं ही लिखते हैं कि-
“किसी भगत (गुरु) ने ऐसे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक या भौगोलिक अंतर्राष्ट्रीय देश की स्थापना की बात नहीं की है। आज से 600 साल पूर्व ऐसे वतन या सर्वमानवीय देश के बारे में सोचना और घोषणा करना, उसकी रूपरेखा तैयार करना गुरु रविदास जी जैसे विश्व-मानव, देवता समान पुरुष और गुरु रूप भगत के हिस्से ही आ सका है। हमारा सिर अपने आप ही उनकी महान प्रतिभा के आगे झुक जाता है।”
डॉ. सुरेंद्र कुमार देवेश्वर गुरु रविदास जी की ‘बेगमपुरा’ की विचारधारा का जिक्र करते हुए, उन को रूसो और वाल्टेयर का पूर्वज बताते हैं-
“रूसो के स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के जिन संयुक्त विचारों के बारे में यह समझा जाता है कि, इस संसार के बीच एक नई विचारक क्रांति के जन्मदाता हैं। वास्तव में यह विचार तो यह भारतीय संत परंपरा के बीच चौदहवीं पन्द्रहवीं सदी के बीच प्रचार किए गए। संत रविदास की वाणी और प्रचार के ये समस्त विचार थे। यूं भगत (गुरु) जी वैचारिक क्रांति के बीच रूसो, वाल्टेयर के भी पूर्वज माने जाते हैं।””
इस कथन से स्पष्ट है कि गुरु रविदास जी विश्व के सबसे पहले क्रांतिकारी विचारधारक और प्रचारक थे।
डाक्टर देवेश्वर बेगमपुरा की विचारधारा का अध्ययन करने के उपरांत नीचे लिखे निष्कर्ष पर पहुंचते हैं –
“इस शब्द की अंतरात्मा राजश्री तौर से लोकतंत्र, आर्थिक तौर से सभाजवादी राज और आत्मिक तौर से कलात्मक जगत, जिस में सत्यम, शिवम, सुंदरम का पहरा है। हर व्यक्ति के सर्वपक्षीय विकास के लिए यहां पूर्ण अवसर प्राप्त हैं।”
उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट हो गया है, कि गुरु रविदास जी विश्व के सबसे पहले क्रांतिकारी राजनीतिक और आर्थिक विकास के लिए समाजवादी लोकतंत्र के चिंतक, सामाजिक तौर से विश्व भाईचारे के सुजक और उच्च स्तर के अध्यात्मवादी हैं। इसलिए वह दुनिया के पहले महानतम चिंतक हैं-
इतनी महानता के शिखर पर पहुंच कर भी गुरु ग्रंथ साहब को मानने वाले और विचार करने वाले सिख जगत के विद्वानों को गुरु रविदास जी की विचारधारा को दुनिया में उजागर कर के प्रचार करने का विचार तक भी क्यों नहीं आया ? इसका क्या कारण है ? इसका उत्तर सरदार करतार सिंह वैद्य बड़े निर्भीक होकर देते हुए स्पष्ट करते हैं, कि गुरु रविदास जी अछूत होने के कारण गुरमत के क्षेत्र में पछाड़े गए हैं। वे लिखते हैं-
गुरु रविदास जहां उच्च कोटि के अध्यात्मवादी थे, वहां वह समाजवादी विचारधारा के नेता भी थे। कल्याणकारी राज (Welfare State) के समर्थक और इंकलाब के पुजारी थे। रविदास जी का जलाल इस कारण अधिक लोकप्रिय नहीं बन सका, जितना कि गुरमत बन सका है, क्योंकि इन की नाम लेवा सँगत आर्थिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर से प्रवीण नहीं थी। जागरूक नहीं थी। पिछड़ी जातियों के गुरु पीर भी पछाड़े जाते रहे हैं, जबकि वह भी उसी स्तर तकमील की बात कहते थे, जिसकी दूसरे कहते थे।